Wednesday, December 22, 2010

पिता....का मूल्य

पिता....का मूल्य
पिता जीवन है, संबल है, शक्ति है.
पिता स्रष्टि के निर्माता कि अभिव्यक्ति है.
पिता अंगुली पकडे बच्चे का सराहा है.
पिता कभी कुछ मीठा है तो कभी कुछ खारा है.
पिता परिवार का अनुशासन है, रोटी,कपडा और मकान है.
चहेते से परिंदे का बड़ा आसमान है.
पिता अप्रदर्शित,अनंत प्यार है.
पिता है तो बच्चों को इंतजार है.
पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं.
पिता है तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं.
पिता से परिवार में राग प्रतिपल राग है.
पिता से ही मां कि बूंदी और सुहाग है.
पिता परमात्मा कि जगत के प्रति आसक्ति है.
पिता गृहस्थाश्रम में उच्च स्थिति  कि भक्ति है.
पिता अपनी इच्छाओं का हनन और परिवार कि पूर्ति है.
पिता रक्त में दिए हुए संस्कारों कि मूर्ति है.
पिता एक जीवन को जीवन दान है.
पिता दुनिया दिखाने का अहसास है.
पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हात है.
पिता नहीं तो बचपन अनाथ है.
तो पिता से बड़ा तुम अपना नाम करो.
पिता का अपमान नहीं,अभिमान करो.
क्योंकि माँ बाप कि कमी कोई पात नहीं सकता.
ईश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता.
दुनिया में किसी भी देवता का स्थान दूजा है.
माँ बाप की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है.
विश्व में किसी भी तीर्थ की यात्रा सब व्यर्थ है.
यदि बेटे के होते हुए माँ बाप असमर्थ है.
वो खुशनसीब होते हैं,माँ बाप जिनके साथ होते है.
क्योंकि माँ बाप के आशीषों के हजारों हाथ होते हैं.

रमाकांत चौधरी-आर्थिक पत्रकार-व्यापार-मुंबई.
  



 

Sunday, December 19, 2010

परम्परा....बेटियां

परम्परा....

ओस की एक बूंद सी होती है बेटियां

स्पर्श खुरदरा हो तो रोटी है बेटियां

रोशन करेगा बेटा तो एक ही कुल को

दो दो कुलों की शान बढाती है बेटियां

कोई नहीं दोस्तों एक दुसरें से कम

हीरा अगर है बेटा तो मोती है बेटियां

काँटों की राह पे ये खुद चलती रहेंगी

औरों के लिए फूल ही बोटी है बेटियां

विधि का विधान है यही दुनिया की रस्म है

अपने पिर्यों को छोड़ पिया के घर जाती है बेटियां

धन्यवाद
रमा कान्त चौधरी आर्थिक पत्रकार मुंबई 

Friday, January 15, 2010

सत्य की खोज

नई देल्ही-आज लोग सत्य से अपना मुख मोड़ रहें है जो कि वह अपने लिए अच्छा नही कर रहें है। आज के कलयुग मैं सत्य का मामूली से पालन करने पर ईश्वर कि प्राप्ति आसानी से हो सकती है। लेकिन आज कि अंधी भागम भाग मैं लोग सब कुछ भूलते जा रहें हैं कि सत्य के ही सहारे इस दुनिया से पार पा सकते हैं। आज असत्य का बोलबाला हो गया है और अनेतिक कार्य करते जा रहीं है। जब भुगतना पड़ता है तो पता चलता है कि अब सरत्या अपनाया जाए तब तक काफी देर हो चुकी होती है।
समाप्त